उच्चतर शिक्षा के रूपांतरण में राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 की भूमिका पर आयोजित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन शामिल हुए


    माननीय राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी,  केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री रमेश पोखरियाल निशंक, राज्यों के राज्यपाल एवं उप राज्यपाल  तथा राज्यों के शिक्षा मंत्रियों के साथ उच्चतर शिक्षा के रूपांतरण में राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 की भूमिका पर आयोजित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग  में मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन शामिल हुए

     नई शिक्षा नीति निजीकरण एवं व्यापारीकरण को बढ़ावा दे रही है जिससे अवसर की समानता के मौलिक अधिकार पर आघात होगा । 

     समवर्ती सूची (Concurrent List) का विषय होने के बाद भी राज्यों से इस सम्बन्ध में बात नहीं करना सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना को चोट पहुंचाता है । 

     इस नीति को लागू करने के लिए बजट का प्रावधान कहाँ से किया जाएगा वह स्पष्ट नहीं है ।

     नई शिक्षा नीति में आदिवासी/दलित/ पिछड़े/ गरीब/ किसान-मजदूर के बच्चों के हितों की रक्षा करने सम्बन्धी प्रावधानों में स्पष्टता का अभाव । 

     रोजगार नीति पर कोई चर्चा नहीं की गयी है । 

     क्षेत्रीय भाषाओँ पर चर्चा करने वक़्त सिर्फ आठवीं अनुसूची में सम्मिलित भाषाओँ का जिक्र एक बहुत बड़े वर्ग के साथ नाइंसाफी होगी । 

     झारखण्ड जैसे भौगोलिक रूप से पिछड़े/ दुर्गम क्षेत्र को नयी नीति से हानि उठानी पड़ेगी । 

     ---श्री हेमन्त सोरेन, मुख्यमंत्री 

    शिक्षा नीति पर अपनी बात रखते हुए श्री सोरेन ने कहा कि आजादी के बाद यह सिर्फ तीसरा मौक़ा है जब शिक्षा नीति पर चर्चा हो रही है , सर्वप्रथम मैं इस पहल के लिए केंद्र सरकार को बधाई देता हूँ । शिक्षा नीति के दूरगामी प्रभाव को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत एक विविधता से भरा देश है, यहाँ विभिन्न राज्यों की जरूरतें अलग-अलग हैं और जैसा कि शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, इसे बनाने में सभी राज्यों के साथ खुले मन से चर्चा होनी चाहिए थी, जिससे  कोई राज्य इसे अपने ऊपर थोपा हुआ नहीं माने । आगे उन्होंने इस नीति को बनाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और परामर्श के अभाव की बात कही । आज जब नीति बनकर तैयार हो गयी है तब केंद्र सरकार राज्यों के साथ इस पर चर्चा कर रही है lअच्छा होता कि इस पर पहले बात होती और सभी राज्य सक्रिय रूप से इसे बनाने में अपनी भागीदारी निभाते । 

    श्री सोरेन ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि विगत कुछ समय से कई सार्वजनिक संस्थानों के निजीकरण के निर्णय , Commercial Mining और GST पर केंद्र सरकार के एकतरफ़ा निर्णय आदि के बाद अब नई शिक्षा नीति के नियमन में राज्यों से सलाह मशविरा का अभाव मुझे सहकारी संघवाद की बुनियाद पर आघात प्रतीत होती है।

    मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन ने आगे अपनी बात रखते हुए कहा कि शिक्षा नीति का प्रभाव हम अगले दशक में देख पाएंगे और लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सरकारें 5 साल के लिए चुनी जाती है, ऐसे में भी इसे सही ढंग से लागू करने के लिए भारत सरकार को सभी राज्य सरकारों एवं राजनितिक दलों से चर्चा करनी चाहिए थी, जो वे नहीं कर पाए । 

    नई शिक्षा नीति में उल्लेखित प्रावधानों पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि कागज़ पर यह Script लुभावना दिखता है, पर इसमें बहुत सारे विषयों पर स्पष्टता नहीं है ।    उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा - 

     आप निजी और विदेशी संस्थानों को आमंत्रित कर रहे हैं परन्तु, आदिवासी, दलित, पिछड़े, किसान-मजदूर वर्ग के बच्चों के हितों की रक्षा के बारे में इस दस्तावेज में कुछ ठोस नहीं कहा गया है । क्या 70-80 % के बीच की जनसंख्या वाले इस बड़े वर्ग के बच्चे लाखों-करोड़ों की फीस दे पाएंगे ? 

         लाखों-करोड़ों की फीस वसूलने वाले निजी विश्व विद्यालय जब हमारे आज के प्रतिष्ठित संस्थानों के प्रोफेसरों के सामने बड़े-बड़े सैलरी पैकेज का ऑफर रखेंगे तो हम अपने पुराने सरकारी संस्थानों के अच्छे प्रोफेसरों को कैसे रोक पाएंगे ? और इससे हानि किस वर्ग के बच्चे-बच्चियों को होगी ?

     प्रधानमंत्री महोदय से मुखातिब होते हुए श्री सोरेन ने कहा कि आप और आपकी पार्टी ने  ने 2010-11 में निजी सस्थानों को बढ़ावा देने सम्बन्धी निर्णय का कड़ा विरोध किया था जिसे झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसे अन्य दलों का समर्थन भी मिला था । तो किन परिस्थितियों में आज नई शिक्षा नीति में विदेशी निजी शिक्षण केन्द्रों को बढ़ावा देने का मन बना लिया गया ? 

         उन्होंने कहा कि शिक्षा नीति के साथ-साथ रोजगार सम्बंधित नीति पर भी इसमें चर्चा होनी चाहिए थी । दोनों लगभग साथ-साथ चलती हैं । परन्तु, वह यहाँ दिख नहीं रहा है । श्री सोरेन ने कहा कि स्कूल में ज्यादा वर्ष गुजारने से अगर बच्चे को रोजगार सम्बंधित फायदा नहीं दिखेगा तो हम चाहें कितनी भी अच्छी शिक्षा नीति बना लें वह सफल नहीं होगी । 

         उन्होंने कहा कि नई नीति को लागू करने में खर्च होने वाली धन राशि कहाँ से आएगी ? झारखण्ड की बात रखते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ हमने शिक्षा में उन्नति को लेकर 2020-21 में राज्य के कुल बजट का 15.6% शिक्षा को समर्पित किया है जो कि पिछले वर्ष से 2 % ज्यादा है ।  नई नीति में कहा गया है कि GDP का 6 % शिक्षा पर खर्च होगा । परन्तु, इसके क्रियान्वयन के चलते राज्यों के कंधों पर अतिरिक्त कितना बोझ आएगा उस पर कुछ बात नहीं की गयी है । 

     नई शिक्षा नीति में क्षेत्रीय भाषाओँ को शिक्षा के माध्यम के रूप में बढ़ावा देने की बात कही गयी है। परन्तु, खेद है कि ऐसा करते वक़्त सिर्फ आठवीं अनुसूची में सम्मिलित भाषाओँ का ही जिक्र किया जा रहा है । यहाँ मैं कहना चाहूंगा कि सिर्फ आठवीं अनुसूची को आधार बनाने से अन्य बहुत भाषाएँ, जो आठवीं अनुसूची का हिस्सा नहीं बन पाई है उसके साथ अन्याय होगा । मेरे राज्य में हो, मुंडारी , उरॉव (कुडुख) जैसी कम-से-कम 5 अन्य भाषाएँ हैं जिन्हें आठवीं अनुसूची में जगह नहीं मिल पाई है, मगर इनके बोलने वालों की संख्या 10-20 लाख है । 

         देश में उच्च शिक्षा हमेशा से Over-Regulated और Under-Funded रही है। विश्वविद्यालयों को समेकित तरीक़े से आगे बढ़ने के लिए, उन्हें Regulate करने के बजाय स्वायत्तता देना ज़्यादा ज़रूरी है। 

     नई  शिक्षा नीति में महाविद्यालयों को बहु-विषयक (Multidisciplinary) बनाने पर जोर देने की बात की गयी है। स्वाभाविक तौर पर ऐसे संस्थानों का निर्माण वहीँ होगा जो पहले से विकसित हों, जहाँ जनसंख्या घनत्व ज्यादा हो, आदि । झारखण्ड एवं इसके जैसे भौगौलिक बनावट वाले राज्यों में या एक ही राज्य के अन्दर कई ढंग के क्षेत्र होते हैं, तो वहां भी यह दिक्कत सामने आएगी । छतीसगढ़ में बिरले निवेशक हिम्मत करेंगे की ऐसा संस्थान बस्तर के इलाके में खोलें, पश्चिम बंगाल में वही हानि जंगल महल के इलाके को उठाना पडेगा तो उड़ीसा में कालाहांडी के क्षेत्र को होगा ।  हमारे उत्तर-पूर्व के राज्य इससे ज्यादा प्रभावित होंगे। मिला-जुला कर देश के सबसे पिछड़े/ उपेक्षित इलाकों में नए संस्थान नहीं के बराबर खुलेंगे। 

    इस मौके पर मुख्य सचिव श्री सुखदेव सिंह,  मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव श्री राजीव अरुण एक्का और शिक्षा सचिव श्री राहुल शर्मा उपस्थित थे l 
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